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RADHEY RADHEY

महासखी-माधुरी · पद 7

सखिन महँ ललिता परम प्रधान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhina mahaṁ lalitā parama pradhāna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सखिन महँ ललिता परम प्रधान।

2गोरोचन सम तनु-दुति दमकति, रति-रस-चतुर सुजान।

3पहिरे पट परिधान मनोहर, मोर पुच्छ उनमान।

4बीरी रुचिर बनाय खवावति, श्यामा-श्यामहिं पान।

5प्यारी पी के ही के नीके, संकेतहिं पहिचान।

6जेहि विधि बढ़े “कृपालु” दुहुँन रति, तिमि आचरति न आन॥

हिन्दी भावार्थ

सखियों में ललिता सखि परम प्रमुख हैं। जिनव गोरोचन के समान देह के रंग की कांति है, एवं प्रेम अंतरंग रसों में दक्ष हैं। मोरपुच्छ के रंग के सुन्दर कपः पहनती हैं। प्रिया-प्रियतम को पान का सुन्दर बीड़ा बनाक खिलाती हैं एवं प्रिया-प्रियतम के हृदय के संकेतों को भली भाँति जानती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि जिस प्रकार प्रिया-प्रियतम के प्रेम में वृद्धि हो, उसी प्रकार का का करती हैं, दूसरा नहीं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 533