महासखी-माधुरी · पद 6
सखिन महँ, नामी चित्रा नाम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhina mahaṁ, nāmī chitrā nāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखिन महँ, नामी चित्रा नाम।
2कुमकुम बरनि सुसोहति तनु-दुति, मोहति कोटिक काम।
3पहिरे कनक-वसन तन मनहर, सुंदर अति अभिराम।
4सौरभ सुरभित सकल सरस-रस, प्यावति श्यामा-श्याम।
5दोउन रुचि जिय जान, चतुर अति, रसिक रँगीली बाम।
6छिन-छिन बढ़ति “कृपालु” प्रीति उर, संग रहति वसुयाम॥
हिन्दी भावार्थ
सखियों में सबसे प्रसिद्ध चित्रा नाम की सखि हैं। कुमकुम के रंग की उनके देह की कांति है एवं करोड़ों कामदेवों को मोहित करने वाली हैं। अत्यंत ही सुन्दर सुनहरे रंग के, मन को हरने वाले कपड़े पहनती हैं। विविध प्रकार के सुगन्धित द्रव्यों से युक्त समस्त मधुर रसों को प्रिया-प्रियतम को पिलाती हैं। एवं प्रिया-प्रियतम की हार्दिक रुचि को जानने वाली, अत्यंत ही प्रेम-रस की रँगीली चतुर नायिका हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि इनका प्रेम प्रतिक्षण तथा सदा ही बढ़ने वाला है, तथा ये सदा ही प्रिया-प्रियतम के साथ रहती हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 532-533