महासखी-माधुरी · पद 5
विशाखा सखि, सखियन सरदार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: vishākhā sakhi, sakhiyana saradāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1विशाखा सखि, सखियन सरदार।
2दामिनि-दुति सम गौर कलेवर, दमकत सुषमा सार।
3पहिरे वसन मनोहर सोहति, तारागन अनुहार।
4रंग बिरंगे वसन पिन्हावति, सदा युगल सरकार।
5जनु प्रतिबिंब संग श्यामा के, रात दिवस इकसार।
6जानत सबै “कृपालु” रीति-रस, प्यारी सों अति प्यार॥
हिन्दी भावार्थ
विशाखा सखि सब सखियों की सरदार के समान हैं। उनका गोरा शरीर बिजली के समान चमकता रहता है। नीले आसमान के तारों से युक्त रंग का कपड़ा पहनती हैं। प्रिया-प्रियतम को रंग-बिरंगे कपड़े पहनाती हैं। रात-दिन किशोरी जी के साथ परछाई के समान रहती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि ये प्रेम-रस की समस्त रीतियों को जानती हैं तथा किशोरी जी से अधिक प्यार करती हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 532