महासखी-माधुरी · पद 4
रंगदेवी सखियन सरनाम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: raṅgadevī sakhiyana saranāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1रंगदेवी सखियन सरनाम।
2पुंडरीक-किंजल्क बरन तनु, लखि लाजत शत काम।
3पहिरे वसन जपा कुसुमन रँग, सोहति अति अभिराम।
4विविध भाँति भूषण पहिरावति, नित प्रति श्यामा-श्याम।
5परम चतुर श्रृंगार-कला महँ, नहिं पटतर कोउ बाम।
6रहति “कृपालु” निकुंजविहारिणि, संगहिं आठों याम॥
हिन्दी भावार्थ
रंगदेवी सखि समस्त सखियों में प्रख्यात सखि है इनके शरीर का रंग कमल के केशर के समान है एवं इनकी रूप-माधुरी से सैकड़ों कामदेव लज्जित होते हैं। (लाल रंग का बरसाती कीड़ा) के रंग के अत्यन्त ही सुन्दर कपड़े पहनती हैं। यह नित्यप्रति प्रिया-प्रियतम को अनेक प्रकार के गहने पहनाती हैं, एवं शृंगार करने की कला इनकी समानता की चतुर गोपी और कोई नहीं है। कहते हैं कि यह सदा किशोरी जी के साथ रहती हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 527-531