महासखी-माधुरी · पद 3
तुंगविद्या सखियन सरताज।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: tuṅgavidyā sakhiyana saratāja
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1तुंगविद्या सखियन सरताज।
2गौर बरनि, तनु-सुंदरता लखि, सुंदरताहूँ लाज।
3पहिरे पांडुर-वसन मनोहर, अंग-अंग छवि छाज।
4विविध राग लै तान सुनावति, साजि सबै विधि साज।
5गुन-आगरि, नागरि तहँ राजत, जहँ दोउ रहे बिराज।
6लखि “कृपालु” दोउन रुचि रिझवत, महरानिहिं महराज॥
हिन्दी भावार्थ
तुंगविद्या समस्त सखियों की सरताज हैं। इनव गोरा रंग एवं इनकी सुन्दरता को देखकर सुन्दरता भी लज्जि होती है। पांडुरंग के प्रमुख अंगों में कपड़े पहनती हैं, ए समस्त बाजों के साजों को साजकर तान आलाप के सा श्यामा-श्याम को अनेक प्रकार के राग सुनाती हैं। गुण की खानि श्यामा-श्याम के पास ही निरन्तर रहती हैं। "कृपालु कहते हैं कि ये दोनों की रुचि के अनुसार उन्हें प्रस करती हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 526-527