महासखी-माधुरी · पद 2
चंपकलता, सखिन-सिरमोर।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: champakalatā, sakhina-siramora
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1चंपकलता, सखिन-सिरमोर।
2चंपक बरनि सुतनु मनहरनी, नित रह प्रेम-विभोर।
3पहिरे तनु सोहति नीलांबर, अंबर-दुति लिय चोर।
4व्यंजन विविध बनाय खवावति, नित उठि जुगल किशोर।
5जानत प्रीति रीति सब बातन, घातन नेह अथोर।
6जेहि विधि पाव “कृपालु” दोउ सुख, सोइ कर, नित उठि भोर॥
हिन्दी भावार्थ
सखि चम्पकलता समस्त सखियों में श्रेष्ठ हैं। चम्पा के समान इनके शरीर का रंग मनोहर है, एवं ये निरंतर ही प्रेम-विभोर रहती हैं। आकाश के रंग को भी चुराने वाले नीले रंग के कपड़े पहनती हैं। श्यामा-श्याम को अनेक प्रकार के व्यंजन बनाकर निरंतर ही खिलाती हैं। प्रीति की रीति को एवं उसकी घातों को पूर्ण रूप से जानती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि जिस प्रकार से भी दोनों में अधिक-से-अधिक प्रेम बढ़े उसी प्रकार का नित्यप्रति आचरण करती हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 526