महासखी-माधुरी · पद 1
इंदुलेखा सखियन गल हार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: indulekhā sakhiyana gala hāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1इंदुलेखा सखियन गल हार।
2सोहति अति हरिताल बरन तनु, रूप-माधुरी-सार।
3पहिरे दाड़िम-बरन वसन सब, लखि लाजत श्रृंगार।
4रति-रस-प्रेम-कलानि सिखावति, सदा युगल सरकार।
5मोहन, वशीकरण-मंत्रादिक, सब की जाननिहार।
6याही ते “कृपालु” यह दोउन, अति प्रिय सखिन मझार॥
हिन्दी भावार्थ
इन्दुलेखा सखि समस्त सखियों की पूज्य एवं प्रि हैं। इनके शरीर का रंग हरिताल के समान है, यह सौन्दर्य व सार-रूप हैं। अनार के रंग के कपड़े पहनती हैं एवं उनव देखकर शृंगार भी लज्जित होता है। यह सदा प्रिया-प्रियत को प्रेम-रस की अन्तरंग, मार्मिक क्रियाएँ सिखाती हैं। मोहः वशीकरण आदि सभी तन्त्र-मन्त्र जानती हैं। 'कृपालु' कह हैं, अतएव यह प्रिया-प्रियतम दोनों को ही समस्त सखियों अत्यन्त प्रिय हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 525