श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 97
हरि! जनि, मो कहँ आँखि दिखायो।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hari! jani, mo kahaṁ āṁkhi dikhāyo
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हरि! जनि, मो कहँ आँखि दिखायो।
2अपनी गाय हिगारि चरावहु, कियो बहुत मन भायो।
3हौं सहि सकौं न धौंस तिहारी, केहि बल रह डहकायो।
4बलभैया को अनुज जानि हौं, अब लौं तोहिं बचायो।
5कबहूँ जाय खिरक परि सोयो, कबहुँक वेनु बजायो।
6तुम्हरे बाबा को नहिं चाकर, जाकर धौंस बतायो।
7खात न नंद बबा को दीनो, रहत न उन घर छायो।
8सखन रिसाने मोहन जाने, नैन नीर भरि आयो।
9सखे! “कृपालु” लोकहूँ दीखत, गोद लियो इतरायो॥
हिन्दी भावार्थ
(श्रीकृष्ण एवं सखाओं में गायों के बहोरने के बारे में कुछ झगड़ा हो गया है, इस पर सखा लोग श्रीकृष्ण को डाँट रहे हैं।) अरे कन्हैया! तुम हमें आँख मत दिखाना। अपनी गायों को निकालकर पृथक् कर लो तथा अपने-आप चराओ। तुमने बहुत मनमाना कर लिया है। हम बार-बार तुम्हारी धौंस नहीं सह सकते, तुम अपने को क्या समझते हो? तुमको अब तक हम बलराम का छोटा भाई समझकर बचाते रहे हैं। तुम कभी जाकर डेरे पर सो जाते हो, कभी किसी पेड़ पर चढ़कर वंशी बजाया करते हो। हम गाय चराने के लिए तुम्हारे बाप के नौकर नहीं हैं, जिनका बार-बार भय दिखाते हो तथा तुम्हारे नन्दबाबा का दिया हुआ भी नहीं खाते एवं उनके छवाये हुए घर में भी नहीं रहते। समझे! अपने प्यारे सखाओं को इस प्रकार क्रुद्ध देखकर श्रीकृष्ण की आँखों में आँसू भर आये क्योंकि उन सखाओं के बिना श्रीकृष्ण एक क्षण भी नहीं रह सकते। इतने में ही व्यंग्य-रूप से 'कृपालु जी' कहने लगे प्यारे सखाओं! मैंने संसार में भी देखा है कि गोद लिया हुआ बहुत इतराया करता है। आखिर यह भी तो नन्द के गोद आये हैं, पुत्र तो वसुदेव के हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 356-358