श्री राधा-बाल लीला-माधुरी · पद 1
कीर्ति घर प्रकटीं कीर्ति कुमारि।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kīrti ghara prakaṭīṁ kīrti kumāri
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कीर्ति घर प्रकटीं कीर्ति कुमारि।
2ब्रह्मादिक स्वस्त्ययन पाठ कर, अस्तुति करि श्रुति चारि।
3नारदादि विरदावलि गावत, कहि जय भानुदुलारि।
4ताण्डव नृत्य करत शिवशंकर, सुधि बुधि देह बिसारि।
5उमा रमा ब्रह्माणी आदिक, आरति कुँवरि उतारि।
6लखत “कृपालु” ज्ञानिजन इकटक, पुनि पुनि कहि बलिहारि॥
हिन्दी भावार्थ
आज महारानी श्री कीर्ति जी के महल में श्री राधिका जी का प्राकट्य हुआ है, जिसके उपलक्ष्य में ब्रह्मादिक देवाधिदेव वेदमन्त्रों से स्वस्त्ययन पाठ कर रहे हैं एवं चारों वेद मूर्तिमान होकर ऋचाओं के द्वारा स्तुति कर रहे हैं। नारदादि महर्षि वृषभानुनन्दिनी की जयकार बोलते हुए यशोगान कर रहे हैं। भगवान् शंकर शरीर की सुधि-बुधि भूल कर, आनन्द में विभोर, ताण्डव नृत्य कर रहे हैं। पार्वती, महालक्ष्मी एवं ब्रह्माणी आदि महाशक्तियाँ कीर्तिकुमारी की आरती उतार रही हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि दर्शनीय दृश्य तो यह है कि जिनके लिए ब्रह्म अदृष्ट एवं अशरीर आदि है, वे परमहँस लोग भी वृषभानुनन्दिनी को देख-देखकर, प्रेम-विभोर होकर, 'बलिहारी है', 'बलिहारी है' का नारा लगा रहे हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 368-369