श्री राधा-बाल लीला-माधुरी · पद 2
भइँ कुँवरि भूप वृषभान के।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bhaiṁ kuṁvari bhūpa vṛishabhāna ke
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1भइँ कुँवरि भूप वृषभान के।
2थिरकत चले झुंड ग्वालन अरु, झुण्ड सबै वनितान के।
3भई भीर वृषभानु भूप घर, शोर बधाइन गान के।
4कोउ कछु कहत न कोउ कछु पूछत, बंद सबै पट भान के।
5कीरति मातु लुटावति दोउ कर, थार भरे मोतियान के।
6पै “कृपालु” सब भानुकुँवरि के, भूखे दर्शन-दान के॥
हिन्दी भावार्थ
आज श्री वृषभानु राजा के घर में श्री राधिकाजी का जन्म हुआ है, जिसके उपलक्ष्य में थिरकते हुए ग्वालों के झुण्ड एवं नृत्य करती हुई ब्रजांगनाओं की वृषभानु के महल में बहुत बड़ी भीड़ हो गयी है। एवं चारों ओर बधाई गान की ही तुमुल ध्वनि हो रही है। समस्त ब्रजवासी इतने प्रेम-विभोर हो गये हैं कि न तो कोई किसी से कुछ कहता ही है और न तो कोई किसी से कुछ पूछता ही है। समस्त ब्रजवासी अपनी (भान) सुध-बुध खो चुके हैं। कीर्ति मैया मोतियों से भरी हुई थालियों को दोनों हाथों से लुटा रही हैं फिर भी, 'कृपालु' कहते हैं कि कोई लूटने वाला नहीं है क्योंकि समस्त जनता एकमात्र श्री वृषभानु-नन्दिनी के दर्शन की ही भूखी है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 369