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श्री राधा-बाल लीला-माधुरी · पद 3

भानुभूप-घर बजत बधाई।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bhānubhūpa-ghara bajata badhāī

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1भानुभूप-घर बजत बधाई।

2प्रकटीं अंक लली कीरति के, देव वृंद दुंदुभिहिं बजाई।

3सब विधि सज्यो आजु बरसानो, लखि कोटिन बैकुँठ लजाई।

4चहुँ दिशि विविध बाजने बाजत, परत न कहुँ कछु शब्द सुनाई।

5भरिभरि मूठि मणिन मोतिन की, यद्यपि कीरति मातु लुटाई।

6तदपि न लूटनि की सुधि काहुहिं, सबै विदेह, देह पद पाई।

7विधि हरि हर सुर कहत एक सुर, जय जय ह्लादिनि शक्ति सुहाई।

8करत “कृपालु” निछावर तापर, निज कर कोटि ब्रह्म सुख जाई॥

हिन्दी भावार्थ

श्री वृषभानुनन्दिनी के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में वृषभानु राजा के महल में बधाई बज रही है। कीर्ति की गोदी में श्री किशोरी जी का प्राकट्य हुआ है। अतएव आनन्द विभोर होकर समस्त देवता दुंदुभी बजा रहे हैं। श्री बरसाना धाम सभी प्रकार से सजा हुआ है, जिसकी सजावट को देखकर करोड़ों बैकुंठ भी लज्जित होते हैं। चारों ओर अनेक प्रकार के बाजे बज रहे हैं, जिनके तुमुल स्वर में किसी व्यक्ति के बोले हुए शब्द, कोई भी नहीं सुन पा रहा है। आनन्दातिरेक से कीर्ति माता यद्यपि मणियों एवं मोतियों को दोनों हाथों की मुट्टियों में भर-भर कर लुटा रही हैं, फिर भी एक भी व्यक्ति को उन मणियों एवं मोतियों को लूटने की सुधि ही नहीं है। ने विदेह पद पा लिया है। देवतागण एक स्वर से "'श्री ह्रदिनी शक्ति की जय हो ह्रादिनी शक्ति को जय हो ''ऐसा नारा लगा रहे हैं। कहते हैं कि हम भी उपर्युक्त जन्म दिवस के आनन्द के ऊपर अपने ही हाथों करोड़ों ब्रह्मानन्द न्यौछावर करके फेंक रहे हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 370-371