श्री राधा-बाल लीला-माधुरी · पद 4
चलो अलि देखन भानुलली।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: chalo ali dekhana bhānulalī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1चलो अलि देखन भानुलली।
2आनंदहुँ आनंद देति यह, ह्लादिनि-शक्ति अली।
3रूपहिं रूप रसहिं रसदायिनि, प्रेम-पियूष पली।
4लोग लुगाइन गाइ बधाइन, कीरति महल चली।
5चोवा चंदन विविध सुगंधनि, सुरभित गली गली।
6सबै विभोर “कृपालु” प्रेम-रस, जनु कोउ छलिन छली॥
हिन्दी भावार्थ
श्री वृषभानुनन्दिनी के जन्म के उपलक्ष्य में एक ब्रजांगना अपनी अन्तरंग सखी से कहती है कि हे सखि! चलो कीर्तिकुमारी के दर्शन कर आवें। यह कीर्तिकुमारी ह्रादिनी शक्ति की अवतार हैं। साक्षात् आनन्द को भी आनन्द देने वाली हैं। साक्षात् रूप को भी रूप एवं रस को भी रस प्रदान करती हैं। ये प्रेम रूपी अमृत में पली हुई हैं। देखो तो सखि! इनके दर्शन के लिये समस्त नर-नारी बधाइयाँ गाते हुए महारानी कीर्ति के महल की ओर जा रहे हैं और देख सखि! आज बरसाने की प्रत्येक गली चोवा, चन्दन आदि अनेक सुगंधित द्रव्यों से महक रही है। कृपालु' के शब्दों में ऐसा प्रतीत होत है जैसे किसी जादूगर ने सब के ऊपर जादू कर दिया है क्योंकि आज समस्त जनता प्रेम-रस विभोर है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 371