श्री राधा-बाल लीला-माधुरी · पद 5
पालने झूलति भानुदुलार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: pālane jhūlati bhānudulāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1पालने झूलति भानुदुलार।
2रतन-जटित चंदन को पलनो, रेशम डोरी डार।
3नील वसन शिशु भूषन-भूषित, गौर-बदनि सुकुमार।
4लोरी गाय, झुलाय माय मन, भाय जाय बलिहार।
5कर गहि पग अँगुठा मुख मेलति, अवहेलति तिय मार।
6किलकनि, लखनि, पाणि पग पटकनि, लीला ललित अपार।
7लखि “कृपालु” ललचाति मातु टुक, मो ढिंग कुँवरि निहार॥
हिन्दी भावार्थ
वृषभानुनन्दिनी राधिका पालना झूल रही हैं। पालना अनेक प्रकार के रत्नों से जटित है। चन्दन की लकड़ी है। रेशम की डोरी है। नीला वस्त्र पहने हैं। नवजात बालिकाओं के श्रृंगार से युक्त हैं, गोरे रंग की हैं। मैया आनन्द विभोर होकर पालना झुलाती हुई बलिहार जाती है। राधिका जी अपने क से अपने पैर का अँगूठा पकड़कर अपने मुख में डालती हैं। उनके सौन्दर्य को देखकर कामदेव की स्त्री रति भी लज्जित होती है। वे किलकारी मारने, भोलेपन से देखने एवं हाथ-पैर उछाल-उछाल कर पटकने की अनेक मधुर लीलाएँ कर रही हैं कृपालु' कहते हैं कि कीर्ति मैया ललचाती हुई लाली की ओर बार-बार इस दृष्टिकोण से देखती हैं कि लाली एक बार मेरी ओर भी निहार दे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 372