श्री राधा-बाल लीला-माधुरी · पद 6
मेरी प्रानन प्यारी जाग रे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: merī prānana pyārī jāga re
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मेरी प्रानन प्यारी जाग रे।
2लाली भानु भानुलाली लखु, बगरावति वन बाग रे।
3आयो भानु जगावन धरि तनु, वात्सल्य अनुराग रे।
4महकत मंद पवन चहुँ चहकत, खग वन बाग तड़ाग रे।
5नहिं पिवाय थन सुरभिन बछरन, परखत तोहिं रस पाग रे।
6जब “कृपालु” कह"आय कान्ह उठु", उठीं नींद गइ भाग रे॥
हिन्दी भावार्थ
कीर्ति-मैया छोटी सी किशोरी को जगाती हुई कहती हैं-''हे मेरे प्राणों से भी अधिक प्यारी लाली! देख तो! सूर्य की किरणें समस्त पृथ्वी पर प्रकाशित हो गयीं, नेत्र खोल, और देखो तो, तुम्हारे पिता के नाम वाला यह भानु अपनी किरणों द्वारा जैसे वात्सल्य-प्रेम बिखेर रहा है। (प्रेम का स्वरूप लाल रंग का होता है) शीतल-मन्द-सुगन्धित वायु बह रही है। वन, बाग, तालाब में अनेक प्रकार के पंछी चहक रहे हैं और सब से बड़ी बात सुनो, तुम्हारे बिना गायें अपने बछड़ों को दूध नहीं पिला रही हैं, फिर तू मक्खन कहाँ से खायेगी।'' इतना कहने पर भी किशोरी जी नहीं उठीं। तब 'कृपालु' ने किशोरी जी के कान में कहा-''अरी लाली! नन्दलाल खेलने के लिए आ गया है!'' यह सुनते ही किशोरी जी की नींद भाग गयी और वे उठकर बैठ गयीं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 372-373