श्री राधा-बाल लीला-माधुरी · पद 7
लली के अलसाने दोउ नैन।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lalī ke alasāne dou naina
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लली के अलसाने दोउ नैन।
2माय उठाय बिठाय दियो पै, कैसेहुँ नैन खुलै न।
3गिरि गिरि परत मातु पकरतहूँ, सो छवि भनत बनै न।
4पुनि पुनि हलरावति दुलरावति, कीरति कहि मृदु बैन।
5उठीं न तबहुँ तबहिं कह जनि उठु, बनिहौं मैया मैं न।
6सबरो माखन देन जात अब, श्रीदामहिं सुखदैन।
7सुनि “कृपालु” दिय खोलि नैन पै, कछु रिस नैनन सैन॥
हिन्दी भावार्थ
(प्रातः काल सोकर उठने पर किशोरी जी की मनोहर झाँकी) किशोरी जी की आँखों में नींद भरी हुई है। यद्यपि मैया ने किशोरी जी को उठाकर बिठा दिया फिर भी किसी प्रकार उनकी आँखें नहीं खुलती। मैया के दोनों हाथों से पकड़ने पर भी वे बार-बार गिरी पड़ती हैं, वह झाँकी देखते ही बनती है। मैया अनेक मीठी-मीठी बातों के द्वारा किशोरी जी को बार-बार दुलार करती हैं, बार-बार हिलाती हैं। जब किशोरी जी इतना करने पर भी नहीं उठीं, तब मैया कहती हैं-मत उठो, मैं तुम्हारी मैया नहीं बनूंगी, श्रीदामा की मैया बनूँगी, और अभी सारा मक्खन उसी को देने जा रही हूँ'। कृपालु' कहते हैं कि यह सुनकर किशोरी जी ने आँखें खोल दीं किन्तु भौंहों में बाल-स्वभावानुसार ईर्ष्यायुक्त-क्रोध झलक रहा था।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 373-374