श्री राधा-बाल लीला-माधुरी · पद 8
माय! दे चंद्र खिलौनहिं लाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: māya! de chandra khilaunahiṁ lāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1माय! दे चंद्र खिलौनहिं लाय।
2धरि धरि चिबुक कुँवरि कीरति को, कहति ठुनकि तुतराय।
3हौं मैया! चंदा सँग खेलिहौं, सो मोहिं अति मन-भाय।
4तब लौं हौं नहिं माखन खैहौं, जब लौं नाहिं मँगाय।
5तोसों बात न करिहौं लेइहौं, औरहिं माय बनाय।
6कोउ भूषण कबहूँ न पहिरिहौं, दैहौं बसन बहाय।
7जइहौं भाजि सखिन घर तुम्हरे, घर रह मोरि बलाय।
8मातु हठीली लली चंद्रमहिं, दर्पन लाय दिखाय।
9भोरी कुँवरि जानि साँचो तेहि, किलकति पकरति धाय।
10जब “कृपालु” नहिं पकरि पाय तब, कह कछु मुँह लटकाय॥
हिन्दी भावार्थ
छोटी सी किशोरी जी कहती हैं-'अरी मैया! चन्द्र खिलौना ला दे''। रखकर ठुनक कर तोतली भाषा में कहती हैं-'अरी मैया! मुझे चन्द्रमा बहुत अच्छा लगता है, मैं तो उसी के साथ खेलूँगी। जब तक तू चन्द्रमा को नहीं मँगा देगी तब तक मैं मक्खन नहीं खाऊँगी और तुझसे बात भी नहीं करूँगी, दूसरी मैया बना लूँगी। कोई गहना कभी नहीं पहनूँगी, सब कपड़े फेंक दूँगी और सखियों के घर में भाग जाऊँगी, तेरे घर में मेरी बलाय रहे।'लाली के हठ को देखकर मैया ने शीशा लाकर चन्द्रमा को दिखा दिया। भोली-भाली किशोरी जी चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को सचमुच ही समझकर किलक-किलक कर उसे बार-बार पकड़ने लगीं। 'कृपालु' कहते हैं जब किशोरी जी किसी प्रकार नहीं पकड़ पायीं तब गुस्से में मुँह लटकाकर कुछ भुनभुजाने लगीं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 374-375