श्री राधा-बाल लीला-माधुरी · पद 9
कुँवरि की लरिकैयन की बानि।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kuṁvari kī larikaiyana kī bāni
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कुँवरि की लरिकैयन की बानि।
2धनि सो कीरति मातु निहारति, वारति तन मन प्रान।
3मैया सों"ऐया"कहि टेरति,"पापा"कहि वृषभान।
4किलकति द्वैक दँतुलियनि आपुहिं, कारन नहिं कोउ जान।
5झलकति झँगुली नील बदन पर, नील गगन उनमान।
6ह्लादिनि शक्ति “कृपालु” भक्ति वश, प्रकटीं रस की खान॥
हिन्दी भावार्थ
समस्त विश्व में कीर्ति मैया के धन्य भाग्य हैं जो लाडली जी की बाल-लीलाओं को देखती हुई अपना सर्वस्व न्यौछावर करती हैं। लाड़िली जी मैया को 'ऐया'कहकर एवं बाबा को पापा कहकर बुलाती हैं। अपने आप निकले हुए आगे के दो एक दाँत से हँसती हुई किलकती हैं। इसका कारण कोई नहीं जान सकता। उनके गौर रंग के शरीर के ऊपर नीले रंग की झंगुली नीले आकाश के समान सुशोभित हो रही है। कृपालु' कहते हैं कि वृषभानुनन्दिनी राधिका ह्वादिनी-शक्ति स्वरूपा हैं, रस की खान हैं, प्रेम के अधीन होकर कीर्ति मैया की बेटी बनकर आयी हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 375-376