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RADHEY RADHEY

श्री राधा-बाल लीला-माधुरी · पद 10

कुँवरि की किलकनि की बलि जाउँ।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kuṁvari kī, kilakani kī bali jāuṁ

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1कुँवरि की किलकनि की बलि जाउँ।

2अति द्रुत गवनि घुटुरुवनि आँगन, लखि लखि हौं ललचाउँ।

3गौर बदन पर नील झँगुलियनि, झलकनि लखि मन भाउँ।

4मणिन-खंभ प्रतिबिंब विलोकनि, लखि सुधि-देह भुलाउँ।

5रुनझुन पग पैंजनियनि सुनि सुनि, फूलो अँग न समाउँ।

6देखत बनत “कृपालु” न लेखत, किमि उपमाहिं लजाउँ॥

हिन्दी भावार्थ

श्री वृषभानुनन्दिनी की किलकारी मारने की लीला पर बलिहार जाता हूँ। उनको वृषभानु के आँगन में घुटने के बल तेजी के साथ चलते हुए देख-देखकर बार-बार देखने को जी चाहता है। उनके गोरे रंग के शरीर पर नीले रंग की झँगुली की झलक अत्यन्त मनोहारिणी है। मणियों के खम्भ में उनका प्रतिबिम्ब देखकर अपनी सुधबुध भूल जाता हूँ। उनके चरणों के नूपुर की रुनझुन ध्वनि को सुनकर मैं फूला नहीं समाता। 'कृपालु' कहते हैं कि उनकी बाल लीलाओं की झाँकी देखते ही बनती है, लिखते नहीं बनती, फिर मैं बेचारी उपमा को क्यों लज्जित करूँ।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 376