श्री राधा-बाल लीला-माधुरी · पद 11
कुँवरि रहिं, कीरति सों विरुझाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kuṁvari rahiṁ, kīrati soṁ birujhāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कुँवरि रहिं, कीरति सों विरुझाय।
2"ऊँ ऊँ"करि झगरति झकझोरति, मैया बलि बलि जाय।
3पग पटकति, मटकति, गर लटकति, कह कछु मुख लटकाय।
4वा बाँकी झाँकी झांकन हित, शंभु समाधि भुलाय।
5कही माय"बतराय बात का?"कहीं कुँवरि तुतराय।
6एँड़ी लौं वेणी कब ह्वैहैं, तो सम मो बतराय।
7कही माय, अरि कुँवरि अबहिं तू, पाँच बरस की आय।
8जब तू होय बड़ी तब वेणिहुँ, बड़ी होयगी वाय।
9कुँवरि कही, मैया! मोहिं अबहीं, दे ना बड़ी बनाय।
10दउँ बनाय जो बड़ी, माय कह, तो केहि गोद खिलाय।
11सुनि “कृपालु” यह कुँवरि किलकि गई, माय कंठ लिपटाय॥
हिन्दी भावार्थ
छोरी-सी किशोरी जी कीर्ति मैया से मचल रही हैं। ऊँ-ऊँ करके झकझोरती हुई झगड़ रही हैं। मैया लली के इस अनूठे व्यवहार पर बलिहार जा रही हैं। किशोरी जी मरकती हुई पैर पटकती हैं, मैया के गले लटकती हैं एवं मुँह मटका कर कुछ कहती हैं। किशोरी जी की इस बाललीला सम्बन्धी मान-माधुरी की झाँकी के लिए भगवान् शंकर अपनी समाधि भुला देते हैं। अस्तु, मैया ने पूछा ''अरी लाली! बात क्या है?''किशोरी जी ने तुतलाकर कहा-''अरी मैया! तेरी सी ऐड़ी पर्यन्त लम्बी मेरी वेणी कब होगी?''मैया ने कहा-'अरी लाली! अभी तो तू पाँच बरस की है जब तू मेरे बराबर बड़ी हो जायगी तो तेरी वेणी भी मेरे बराबर बड़ी हो जायगी।'मैया ने कहा-'अरी लाली! जो अभी मैं तुझको बड़ी बना दूँगी तो फिर किसको गोद में खिलाऊँगी'। 'कृपालु' कहते हैं कि किशोरी जी यह सुनकर आनन्द-विभोर होकर किलकारी मारकर मैया के गले से लिपट गयीं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 377-378