श्री राधा-बाल लीला-माधुरी · पद 12
लाड़लिहिं लीला ललित रसाल।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lād̤alihiṁ līlā lalita rasāla
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लाड़लिहिं लीला ललित रसाल।
2तुतरिन बतियन कहति मातु ते, पकरि चिबुक अरु भाल।
3मैया! गई रही खेलन वन, संग सखिन ब्रजबाल।
4इतनेहिं माहिं अनेकनि नौतनु, आई तहँ ततकाल।
5देखन लगीं मोहिं सब इकटक, पुनि चूमेउ मम भाल।
6पुनि कानन कछु कहीं परस्पर, भई शंक मोहिं हाल।
7पुनि “कृपालु” अस कहत चलीं भल, जोरी लालिहिं -लाल॥
हिन्दी भावार्थ
श्री किशोरी जी की बाल लीला सरस से भी सरस है। किशोरी जी कीर्ति-मैया की ठोढ़ी एवं उनका ललाट पकड़कर तोतली भाषा में कहती हैं-''अरी मैया आज मैं ललितादिक सखियों के साथ वन में खेलने गयी थी। वहाँ अनेक युवतियों का अचानक ही एक झुंड आ गया और वे सब घूर-घूर कर मुझे देखने लगीं। फिर प्रत्येक ने मेरे गाल का चुम्बन किया। पश्चात् आपस में कुछ कानाफूसी की, कदाचित् मेरी कोई बुराई को। 'कृपालु' के शब्दों में पुनः वे सब युवतियाँ यह कहती हुई चली गयीं कि लाल एवं लाली की जोड़ी बड़ी ही अनूठी रहेगी।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 378