# पालने झूलति भानुदुलार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0370-M08-K005
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री राधा-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 5
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 174–174

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>पालने झूलति भानुदुलार।  
<a id="line-2"></a>रतन-जटित चंदन को पलनो, रेशम डोरी डार।  
<a id="line-3"></a>नील वसन शिशु भूषन-भूषित, गौर-बदनि सुकुमार।  
<a id="line-4"></a>लोरी गाय, झुलाय माय मन, भाय जाय बलिहार।  
<a id="line-5"></a>कर गहि पग अँगुठा मुख मेलति, अवहेलति तिय मार।  
<a id="line-6"></a>किलकनि, लखनि, पाणि पग पटकनि, लीला ललित अपार।  
<a id="line-7"></a>लखि “कृपालु” ललचाति मातु टुक, मो ढिंग कुँवरि निहार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

वृषभानुनन्दिनी राधिका पालना झूल रही हैं। पालना अनेक प्रकार के रत्नों से जटित है। चन्दन की लकड़ी है। रेशम की डोरी है। नीला वस्त्र पहने हैं। नवजात बालिकाओं के श्रृंगार से युक्त हैं, गोरे रंग की हैं। मैया आनन्द विभोर होकर पालना झुलाती हुई बलिहार जाती है। राधिका जी अपने क से अपने पैर का अँगूठा पकड़कर अपने मुख में डालती हैं। उनके सौन्दर्य को देखकर कामदेव की स्त्री रति भी लज्जित होती है। वे किलकारी मारने, भोलेपन से देखने एवं हाथ-पैर उछाल-उछाल कर पटकने की अनेक मधुर लीलाएँ कर रही हैं कृपालु' कहते हैं कि कीर्ति मैया ललचाती हुई लाली की ओर बार-बार इस दृष्टिकोण से देखती हैं कि लाली एक बार मेरी ओर भी निहार दे।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 372

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
