# हरि! जनि, मो कहँ आँखि दिखायो।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0365-M07-K097
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 97
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 170–171

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>हरि! जनि, मो कहँ आँखि दिखायो।  
<a id="line-2"></a>अपनी गाय हिगारि चरावहु, कियो बहुत मन भायो।  
<a id="line-3"></a>हौं सहि सकौं न धौंस तिहारी, केहि बल रह डहकायो।  
<a id="line-4"></a>बलभैया को अनुज जानि हौं, अब लौं तोहिं बचायो।  
<a id="line-5"></a>कबहूँ जाय खिरक परि सोयो, कबहुँक वेनु बजायो।  
<a id="line-6"></a>तुम्हरे बाबा को नहिं चाकर, जाकर धौंस बतायो।  
<a id="line-7"></a>खात न नंद बबा को दीनो, रहत न उन घर छायो।  
<a id="line-8"></a>सखन रिसाने मोहन जाने, नैन नीर भरि आयो।  
<a id="line-9"></a>सखे! “कृपालु” लोकहूँ दीखत, गोद लियो इतरायो॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(श्रीकृष्ण एवं सखाओं में गायों के बहोरने के बारे में कुछ झगड़ा हो गया है, इस पर सखा लोग श्रीकृष्ण को डाँट रहे हैं।) अरे कन्हैया! तुम हमें आँख मत दिखाना। अपनी गायों को निकालकर पृथक् कर लो तथा अपने-आप चराओ। तुमने बहुत मनमाना कर लिया है। हम बार-बार तुम्हारी धौंस नहीं सह सकते, तुम अपने को क्या समझते हो? तुमको अब तक हम बलराम का छोटा भाई समझकर बचाते रहे हैं। तुम कभी जाकर डेरे पर सो जाते हो, कभी किसी पेड़ पर चढ़कर वंशी बजाया करते हो। हम गाय चराने के लिए तुम्हारे बाप के नौकर नहीं हैं, जिनका बार-बार भय दिखाते हो तथा तुम्हारे नन्दबाबा का दिया हुआ भी नहीं खाते एवं उनके छवाये हुए घर में भी नहीं रहते। समझे! अपने प्यारे सखाओं को इस प्रकार क्रुद्ध देखकर श्रीकृष्ण की आँखों में आँसू भर आये क्योंकि उन सखाओं के बिना श्रीकृष्ण एक क्षण भी नहीं रह सकते। इतने में ही व्यंग्य-रूप से 'कृपालु जी' कहने लगे प्यारे सखाओं! मैंने संसार में भी देखा है कि गोद लिया हुआ बहुत इतराया करता है। आखिर यह भी तो नन्द के गोद आये हैं, पुत्र तो वसुदेव के हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 356-358

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
