श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 96
हमारे, बैर परीं ब्रज बाल।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamāre, baira parīṁ brajabāla
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हमारे, बैर परीं ब्रज बाल।
2ये अति चतुर मातु! मैं भोरो, जानत नहिं कछु चाल।
3मोको इकलो देखि बुलावतिं, उर विष वचन रसाल।
4सरल सुभाय जात ढिंग जब ही, पकरि लेतिं ततकाल।
5"माखन खाय निहाल करहु चलि, मोरेहु घर नँदलाल।
6हौं साँचेहिं पतियाय गयों घर, इन मन रह कछु जाल।
7पुनि पुनि पकरि नचावतिं मो कहँ, मारतिं गुलचन गाल।
8कोउ छोरति अंबर कोउ नूपुर, कोउ मुरली, कोउ माल।
9बाबा की सौगंध खवावतिं,"कहहु आइहौं काल"।
10पुनि बरबस मुख दधि लपटावतिं, हँसतिं सबै दै ताल।
11कर गहि पुनि इत बात बनावतिं, कहँ लौं कहौं कुचाल।
12हौं “कृपालु” बालक ये धींगरि, सुनि सखि होतिं निहाल॥
हिन्दी भावार्थ
(गोपियों के बार-बार उलाहना देने पर श्रीकृष्ण ने अपने को निर्दोष सिद्ध करने के लिए कहा।) मैया! यह समस्त ब्रज-गोपांगनायें हमें तंग करने पर तुली हुई हैं। मैया! यह ब्रज-बालायें अत्यन्त ही चालाक हैं और मुझे तो तू जानती ही है कि कितना भोला-भाला हूँ, किसी प्रकार का भी छल कपट नहीं जानता। मैया! ये गोपियाँ मुझे अकेला देखकर हृदय में विष भरे हुए बड़े ही मधुर स्वरों में बुलाती हैं। और मैं अपने सरल स्वभाव के कारण जैसे ही इनके पास जाता हूँ, वैसे ही ये सब मुझे पकड़ लेती हैं और मुझसे कहती हैं कि, 'हे नन्दलाल! हमारे घर भी चलकर एवं मक्खन खाकर हमें कृतार्थ करो।'मैं इनकी बातों का सचमुच ही विश्वास करके इनके घर जाता हूँ किन्तु इनके मन में कपट ही भरा रहता है। ये ब्रज गोपियाँ मुझे पकड़-पकड़कर सब की-सब बारी-बारी से नचाती हैं एवं सभी हमारे गाल में गुलचे मारती हैं। अरी मैया! कोई तो पीताम्बर छीनती है, कोई नूपुर, कोई मुरली एवं कोई वनमाला छीनती है। अगर तू यह सोचती है कि फिर तू दुबारा क्यों इनके पास जाता है? तो मैया सुन, यह सब मिलकर बरबस बाबा की सौगंध खिलाकर दूसरे दिन आने के लिए भी प्रतिज्ञा करवा लेती हैं। इसके पश्चात् मेरे मुख में हठात् दही लगाकर सभी ताली बजा-बजा कर हँसती हैं। फिर मेरा हाथ पकड़कर तुम्हारे पास लाती हैं और बातें बनाती हैं कि देखो तुम्हारे लाला ने हमारा दही खाया है। मैया! इनकी करतूतों को मैं कहाँ तक कहूँ, मैं तो तंग आ गया। यदि तू यह कहे कि तू कुछ भी नहीं कर सकता? तो कृपालु' कहते हैं कि मैया! मैं क्या करूँ? मैं एक छोटा-सा बालक हूँ एवं ये करोड़ों हृष्ट-पुष्ट देहवाली धींगरी हैं। यह सुनकर सारी गोपियाँ प्रेम में विभोर हो गई और उन्हें धींगरी शब्द पर हँसी आ गई।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 354-356