श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 95
सुनु मुरली वारे कान्ह रे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sunu muralī vāre kānha re
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सुनु मुरली वारे कान्ह रे।
2मुरली मधुर बजाय बुलावत, काहे ब्रजवनितान रे।
3नीरस लकरी सरस होत सुनि, सरस सुरीली तान रे।
4इत हौं दरस हेतु तरसत उत, पकत न टुक पकवान रे।
5पुनि गुरुजनहूँ कहत डाँटि मोहिं, रहत कहाँ तव ध्यान रे।
6भनत “कृपालु” बनत कत इतनो, जानि जानि अनजान रे॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखि कहती है, हे मुरली मनोहर श्यामसुन्दर! तुम अपनी मधुर मुरली की तान छेड़कर ब्रजांगनाओं को क्यों तंग करते हो? तुम्हारी मुरली की सुरीली तान सुनकर हमारी सूखी लकड़ी भी गीली हो जाती है। जिसके परिणामस्वरूप इधर तो मैं तुम्हारे दर्शन के लिए तड़पती हूँ, उधर लकड़ी गीली हो जाने से खाना भी नहीं पकाने पाती। ऐसी स्थिति में माता, पिता, पति आदि गुरुजन डाटते हुए कहते हैं कि तुम्हारा ध्यान आजकल कहाँ रहता है। 'कृपालु' के शब्दों में सखि कहती है कि तुम जान-जानकर इस प्रकार अनजान क्यों बनते हो?
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 354