# सुनु मुरली वारे कान्ह रे।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0363-M07-K095
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 95
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 169–169

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सुनु मुरली वारे कान्ह रे।  
<a id="line-2"></a>मुरली मधुर बजाय बुलावत, काहे ब्रजवनितान रे।  
<a id="line-3"></a>नीरस लकरी सरस होत सुनि, सरस सुरीली तान रे।  
<a id="line-4"></a>इत हौं दरस हेतु तरसत उत, पकत न टुक पकवान रे।  
<a id="line-5"></a>पुनि गुरुजनहूँ कहत डाँटि मोहिं, रहत कहाँ तव ध्यान रे।  
<a id="line-6"></a>भनत “कृपालु” बनत कत इतनो, जानि जानि अनजान रे॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक सखि कहती है, हे मुरली मनोहर श्यामसुन्दर! तुम अपनी मधुर मुरली की तान छेड़कर ब्रजांगनाओं को क्यों तंग करते हो? तुम्हारी मुरली की सुरीली तान सुनकर हमारी सूखी लकड़ी भी गीली हो जाती है। जिसके परिणामस्वरूप इधर तो मैं तुम्हारे दर्शन के लिए तड़पती हूँ, उधर लकड़ी गीली हो जाने से खाना भी नहीं पकाने पाती। ऐसी स्थिति में माता, पिता, पति आदि गुरुजन डाटते हुए कहते हैं कि तुम्हारा ध्यान आजकल कहाँ रहता है। 'कृपालु' के शब्दों में सखि कहती है कि तुम जान-जानकर इस प्रकार अनजान क्यों बनते हो?

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 354

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
