श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 94
सखी सुनु, इक रहस्य की बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī sunu, ika rahasya kī bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी सुनु, इक रहस्य की बात।
2जो मो कहँ भगवान मान सो, मो ते अति डरपात।
3राजा स्वामी मित्र पुत्र पति, भाव पाँच विख्यात।
4जिन भावन सों प्रीति करत जो, हौं जोरत सोइ नात।
5अति नीरस ऐश्वर्य सखी मम, रसिकन नाहिं सुहात।
6तू “कृपालु” प्यारी प्रियतम की, प्रियतम श्यामल गात॥
हिन्दी भावार्थ
एक भोली-भाली सखि को समझाते हुए श्यामसुन्दर कहते हैं कि अरी सखि! एक रहस्य की बात सुन, मुझको जो भगवान् मानता है वह मुझसे भयभीत रहता है, प्यार नहीं कर सकता। मुझसे प्यार करने के लिये शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य इन पाँच भावों के अनुसार क्रमशः राजा, स्वामी मित्र, पुत्र तथा पति ही मानना चाहिये। इन पाँच भावों में जिस भाव से जो भी मुझसे प्यार करता है, मैं भी उससे वही भाव रखता हूँ। अरी सखी! भगवान् सम्बन्धी मेरे छहों ऐश्वर्य अत्यन्त नीरस हैं, वे रसिकों को नहीं अच्छे लगते। इसलिये तू मेरी भगवत्ता के चक्कर में न पड़। 'कृपालु' कहते हैं कि अरी सखि! तू तो केवल इतना ही समझ ले कि तू श्यामसुन्दर की प्रेयसी है एवं श्यामसुन्दर तेरे प्रियतम हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 353