# सखी सुनु, इक रहस्य की बात।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0362-M07-K094
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 94
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 169–169

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सखी सुनु, इक रहस्य की बात।  
<a id="line-2"></a>जो मो कहँ भगवान मान सो, मो ते अति डरपात।  
<a id="line-3"></a>राजा स्वामी मित्र पुत्र पति, भाव पाँच विख्यात।  
<a id="line-4"></a>जिन भावन सों प्रीति करत जो, हौं जोरत सोइ नात।  
<a id="line-5"></a>अति नीरस ऐश्वर्य सखी मम, रसिकन नाहिं सुहात।  
<a id="line-6"></a>तू “कृपालु” प्यारी प्रियतम की, प्रियतम श्यामल गात॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक भोली-भाली सखि को समझाते हुए श्यामसुन्दर कहते हैं कि अरी सखि! एक रहस्य की बात सुन, मुझको जो भगवान् मानता है वह मुझसे भयभीत रहता है, प्यार नहीं कर सकता। मुझसे प्यार करने के लिये शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य इन पाँच भावों के अनुसार क्रमशः राजा, स्वामी मित्र, पुत्र तथा पति ही मानना चाहिये। इन पाँच भावों में जिस भाव से जो भी मुझसे प्यार करता है, मैं भी उससे वही भाव रखता हूँ। अरी सखी! भगवान् सम्बन्धी मेरे छहों ऐश्वर्य अत्यन्त नीरस हैं, वे रसिकों को नहीं अच्छे लगते। इसलिये तू मेरी भगवत्ता के चक्कर में न पड़। 'कृपालु' कहते हैं कि अरी सखि! तू तो केवल इतना ही समझ ले कि तू श्यामसुन्दर की प्रेयसी है एवं श्यामसुन्दर तेरे प्रियतम हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 353

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
