लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 93

सखी मोय, दै जा दधि को दान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! moya, dai jā dadhi ko dāna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सखी मोय, दै जा दधि को दान।

2हौं ब्रज को सरताज न जानति? भरी गरूर गुमान।

3सखी कही मोते जनि अटकिय, मोय न जान कोउ आन।

4हौं ललिता बृषभानुलली की, सखियन परम प्रधान।

5यह ब्रजभूमि लाड़ली जू की, सूधेहिं करहु पयान।

6अबहीं जाय कहौं यशुमति ते, करु साँटी को ध्यान।

7हँसि “कृपालु” कह सखि साँटी हम, खात भये बलवान॥

हिन्दी भावार्थ

(बरसाने की साँकरी-गली में दही बेचने के लिए जाती हुई ललिता को रोकते हुए सखाओं के सँग खड़े होकर श्रीकृष्ण कहते हैं।) हे सखि! मुझे कर-रूप से दही का दान देती जा। मैं इस ब्रज का राजा हूँ, क्या तू यह नहीं जानती? जो इठलाती हुई बड़े गुमान के साथ बिना दान दिये चली जा रही है। सखि ने उत्तर दिया कि मुझसे न अटकना, मुझे कोई ऐसी-वैसी न समझना। मैं वृषभानुनन्दिनी की सखियों में भी प्रमुख सखि ललिता'हूँ। बड़े दुःख की बात है कि ब्रज में रहते हुए भी तुमको अभी तक यह पता नहीं है कि इस ब्रज की महारानी राधिका जी हैं। तुम्हें कौन पूछता है? सीधे ही अपना रास्ता पकड़ो, नहीं तो अभी जाकर तुम्हारी मैया से यह सब बातें कह दूँगी, जिसका क्या परिणाम होगा यह तुम डंडे की मार का ध्यान करके ही समझ सकते हो। 'कृपालु' कहते हैं कि तब भगवान् ने यह कहा कि हे ललिता सखि! हमको सांटी की धौंस मत बता, साँटी खाते-खाते हम अब बलवान् हो गये हैं। बिना दही का दान लिये हम तुझे किसी भी प्रकार आगे नहीं जाने देंगे।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 352-353