# सखी मोय, दै जा दधि को दान।

स्थायी पृष्ठ: https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/pad/prm-0361-m07-k093/
भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0361-M07-K093
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 93
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 168–168

[English](https://radhey.shreyam1008.com.np/en/prem-ras-madira/pad/prm-0361-m07-k093/) · [पुस्तक की अनुक्रमणिका](https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/) · [दोनों भाषाओं में पुस्तक पढ़ें](https://radhey.shreyam1008.com.np/PRM/?pad=361&mode=reader&lang=both) · [दोनों भाषाओं का स्रोत पाठ](https://radhey.shreyam1008.com.np/content/prm/prm-0361-m07-k093.md)

## मूल पद

<a id="line-1"></a>सखी मोय, दै जा दधि को दान।  
<a id="line-2"></a>हौं ब्रज को सरताज न जानति? भरी गरूर गुमान।  
<a id="line-3"></a>सखी कही मोते जनि अटकिय, मोय न जान कोउ आन।  
<a id="line-4"></a>हौं ललिता बृषभानुलली की, सखियन परम प्रधान।  
<a id="line-5"></a>यह ब्रजभूमि लाड़ली जू की, सूधेहिं करहु पयान।  
<a id="line-6"></a>अबहीं जाय कहौं यशुमति ते, करु साँटी को ध्यान।  
<a id="line-7"></a>हँसि “कृपालु” कह सखि साँटी हम, खात भये बलवान॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(बरसाने की साँकरी-गली में दही बेचने के लिए जाती हुई ललिता को रोकते हुए सखाओं के सँग खड़े होकर श्रीकृष्ण कहते हैं।) हे सखि! मुझे कर-रूप से दही का दान देती जा। मैं इस ब्रज का राजा हूँ, क्या तू यह नहीं जानती? जो इठलाती हुई बड़े गुमान के साथ बिना दान दिये चली जा रही है। सखि ने उत्तर दिया कि मुझसे न अटकना, मुझे कोई ऐसी-वैसी न समझना। मैं वृषभानुनन्दिनी की सखियों में भी प्रमुख सखि ललिता'हूँ। बड़े दुःख की बात है कि ब्रज में रहते हुए भी तुमको अभी तक यह पता नहीं है कि इस ब्रज की महारानी राधिका जी हैं। तुम्हें कौन पूछता है? सीधे ही अपना रास्ता पकड़ो, नहीं तो अभी जाकर तुम्हारी मैया से यह सब बातें कह दूँगी, जिसका क्या परिणाम होगा यह तुम डंडे की मार का ध्यान करके ही समझ सकते हो। 'कृपालु' कहते हैं कि तब भगवान् ने यह कहा कि हे ललिता सखि! हमको सांटी की धौंस मत बता, साँटी खाते-खाते हम अब बलवान् हो गये हैं। बिना दही का दान लिये हम तुझे किसी भी प्रकार आगे नहीं जाने देंगे।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 352-353

[पिछला पद](https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/pad/prm-0360-m07-k092/) · [अगला पद](https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/pad/prm-0362-m07-k094/)

## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

- [आधिकारिक पूर्ण साहित्य संग्रह](https://www.jkpliterature.org.in/)
- [लेखक का आधिकारिक परिचय](https://jagadgurukripalujimaharaj.org.in/)
- [प्रेम रस मदिरा: आधिकारिक पुस्तक विवरण](https://www.jkpliterature.org.in/products/prem-ras-madira-regular-size)
- [संस्करण और स्रोत प्रमाण](https://radhey.shreyam1008.com.np/content/provenance.json)
- [पुस्तकालय के आवरणों का स्रोत विवरण](https://radhey.shreyam1008.com.np/content/books/index.json)
- [स्रोत और पाठ-सुधार](https://radhey.shreyam1008.com.np/collection/)

मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
