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RADHEY RADHEY

श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 90

मोहन! मोहिं न आँखि दिखायो।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mohana! mohiṁ na āṁkhi dikhāyo

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1मोहन! मोहिं न आँखि दिखायो।

2हटु जी लँगर करि झगर डगर महँ, माखन चाहत खायो।

3हौं राधे बरसाने वारी, पितु वृषभानु कहायो।

4भाजि जाहु अब बेगि ग्वाल लै, जनि मोय रिस लगवायो।

5ढोर चरावत सब दिन बीतत, चाहत मोहिं चरायो।

6बिनु पितु मातु रूप कारो अति, जाति अहीर जतायो।

7सुनि रिसाय ग्वालन सैनन दै, बरबस दधि लुटवायो।

8सखी विशाखा खीझि श्याम सिर, दधि मटुकी ढुरकायो।

9तब “कृपालु” बलि संग सखिन के, हँसि हँसि ताल बजायो॥

हिन्दी भावार्थ

(बरसाने की साँकरी-गली में राधिका जी से बरबस मक्खन माँगते हुए श्रीकृष्ण का वाद-विवाद।) राधिका जी कहती हैं; 'हे मोहन! मुझे आँख दिखाकर धौंस जतलाने का प्रयत्न मत करना। मार्ग से हट जाओ, झगड़ा करके बरबस मक्खन नहीं पा सकते। तुम कदाचित् यह नहीं जानते कि मैं बरसाने में रहने वाली वृषभानु की बेरी राधिका हूँ। अब तुम्हारी कुशल इसी में है कि शीघ्र ही समस्त ग्वालों को लेकर भाग जाओ। मुझे क्रोध न दिलाओ। सदा से ढोरों को चराते रहे हो, इसी से कदाचित् धौंस बताकर मुझे भी चराना चाहते हो? तुम्हारी वास्तविकता कौन नहीं जानता? तुम्हारे माँ-बाप का पता नहीं है। शरीर का रंग अत्यन्त ही काला है एवं जाति भी अहीर की है।'यह सुनकर श्रीकृष्ण क्रुद्ध हो गये एवं सखाओं को संकेत किया कि मक्खन लूट लो। श्रीकृष्ण के संकेतानुसार सखाओं ने समस्त गोपांगनाओं का दही और मक्खन लूट लिया। इतने में ही अत्यन्त चतुर सखि विशाखा ने खीझकर श्रीकृष्ण के सिर पर पूरी दही से भरी मटुकी ढुलका दी, ताकि जिधर भी जायँ, अपराध स्पष्ट रूप से दिखाई पड़े। कृपालु' कहते हैं कि श्रीकृष्ण को दही में सराबोर देखकर हम सखियों के साथ ताली बजा-बजा हँसने लगे एवं श्रीकृष्ण खिसियाने से रह गये।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 349-350