श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 89
मैया! मैं तो मोहिनि-रूप बनैहौं।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: maiyā! maiṁ to mohini-rūpa banaihauṁ
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मैया! मैं तो मोहिनि-रूप बनैहौं।
2घघरा चुन्नटदार पहिरिहौं, चुनरी शीश धरैहौं।
3बेंदी भाल लाल लगवैहौं, सेंदुर माँग भरैहौं।
4वेणी गूँथि पहिरि नथ बेसर, सुरमा सुघर लगैहौं।
5गर दुलरी, लर हार मोतियन, उर कंचुकी कसैहौं।
6कर करपत्र चुरी कंकण-मणि, मेहँदी लाल रचैहौं।
7घूँघट को पट घनो काढ़िहौं, लाजन लाज लजैहौं।
8नाँव साँवरी सखी धरैहौं, गति हंसहुँ सकुचैहौं।
9कालि छली चंद्रावलि अलि मोहिं, आजु छलन हौं जैहौं।
10छलि “कृपालु” इमि चन्द्रावलि कहँ, हौं तेहि मजा चखैहौं॥
हिन्दी भावार्थ
श्यामसुन्दर अपनी मैया से कहते हैं कि मैं तो मोहिनी रूप बनाऊँगा। चुन्रटदार लहँगा पहिनकर सिर पर चुनरी ओढुँगा। भाल में लाल बिन्दी लगवाऊँगा एवं माँग में सिन्दूर भराऊँगा। बालों की वेणी गूँथ कर नाक में नथ एवं बेसर पहनूँगा। आँखों में सुरमा लगा लूँगा। गले में दुलरी एवं मोतियों के हार पहन कर वक्ष स्थल में चोली धारण करूँगा। हाथ में करपत्र, चूड़ी एवं मणिमय कंकण पहन कर लाल मेहँदी रचाऊँगा। खूब लम्बा घूँघट काढ़ कर लज्जा का ऐसा अभिनय करूँगा कि साक्षात् लज्जा भी लज्जित हो जायगी। अपना नाम साँवरी सखि रखकर चाल से राजहंस को भी लज्जित करूँगा। कल मुझे चन्द्रावलि सखि ने छला है, आज मैं भी उसे छलूँगा। "कृपालु 'के शब्दों में श्यामसुन्दर कहते हैं कि इस प्रकार चन्द्रावलि को छल कर उसे मुझे छलने का भली भाँति मजा चखाऊँगा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 348-349