श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 88
मैया! तेरो, कैसो दैया छैया?।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: maiyā! tero, kaiso daiyā! chhaiyā?
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मैया! तेरो, कैसो दैया छैया?।
2अब लौं सही कही नहिं तोसों, सहि न जात अब मैया।
3नागरि गर लर हार तोर अरु, गागरि फोर कन्हैया।
4चुनरी शीश उतार वार कर, नैनन सों बलभैया।
5"मोरी तोरी जोरी गोरी", कहि कर पकरत दैया।
6बरजु “कृपालु” यशोमति! निज सुत, अब न लाल लरिकैया॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखि उलाहना देती हुई कहती है-अरी दैया अरी मैया! यह तेरा कन्हैया घोर ऊधमी है। अब तक मैं बहुत सहा, तुझसे कभी नहीं कहा किन्तु अब तो सह नहीं जाता। यह कन्हैया ब्रज बनिताओं के गले के हार की लड़ियों को तोड़ कर उनकी मटुकी को भी फोड़ देता है एवं उनके सिर से चुनरी उतार कर भौंह मटकाता हुआ कटाक्षपात करता है। हाय दैया! सबसे बढ़कर गजब तो यह करता कि 'हमारी तुम्हारी जोड़ी बड़ी अच्छी है'ऐसा कह कर हाथ पकड़ लेता है। 'कृपालु' के शब्दों में सखि कहती है-अरी यशोदा मैया! तू अपने लाला को रोक ले, अब लाला को लड़कपन की उम्र नहीं है, नहीं तो अच्छा न होगा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 347-348