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RADHEY RADHEY

श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 87

मैया! तेरे, छैया ने जुलुम करी।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: maiyā! tere, chhaiyā ne juluma karī

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1मैया! तेरे, छैया ने जुलुम करी।

2तट पनघट घूँघट-पट खोलत, देखति सखि सिगरी।

3"नथवारी मम प्राण पियारी", इमि कहि भुज पकरी।

4हटकत ही झटपट लै नटखट, लकुटि फोर गगरी।

5पुनि अति छोट खोट यह ढोटा, जात तुरत भग री।

6अब “कृपालु” हम सब नहिं रहि सक, रहु तुम ही नगरी॥

हिन्दी भावार्थ

एक सखि मैया से उलाहना देते हुए कहती है कि मैया! तेरे कन्हैया ने आसमान सिर पर उठा रखा है। यह यमुना के किनारे पनघट पर मेरा घुँघट खोलता है जिसे समस्त सखियाँ देखती हैं। सांकेतिक भाषा में कहता है कि नथवाली तो मेरी प्राणप्यारी है। फिर ऐसा कह कर मेरा हाथ पकड़ लेता है। जब मैं अपना हाथ छुड़ा लेती हूँ तब यह ऊधमी तुरन्त लठिया मारकर मेरा घड़ा फोड़ देता है और तुरन्त ही भाग जाता है। यह देखने में छोरा है किन्तु वास्तव में अत्यन्त ही खोटा है। 'कृपालु' के शब्दों में सखि कहती है कि अब हम लोग इस नगरी में नहीं रह सकते, अब तुम्हीं अकेली रहो।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 346-347