श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 86
माय! सखि पानिहिं आग लगाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: māya! sakhi pānihiṁ āga lagāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1माय! सखि पानिहिं आग लगाय।
2रोम रोम महँ कपट भर्यो येहि, तू न जान कछु माय।
3याकी सास बताय माय! यह, चोरि चोरि दधि खाय।
4लरिकैयन की बानि परी कछु, सो नहिं छुटत छुटाय।
5जो तेहि डाँट खाय तो झूठेहिं, मेरो नाम लगाय।
6मोहिं न माय पतियाय पूछि ले, मनसुख या बलभाय।
7भोरी माय “कृपालु” मानि गइ, लिये लाल उर लाय॥
हिन्दी भावार्थ
सखि के उलाहने का उत्तर देते हुए छोटे से ठाकुरजी कहते हैं कि-अरी मैया! ये सखियाँ तो पानी में आग लगाने में समर्थ हैं। तू नहीं जानती, इनके रोम-रोम में छल-कपट भरा हुआ है। जो सखि मेरी शिकायत कर रही है इसकी सास ने मुझे बताया है कि यह अपने ही घर में चुरा-चुरा कर दही खाती है। मैया इसका भी क्या दोष है, लड़कपन की आदत किसी की नहीं छूटती। और मैया जब यह सास की डाँट खाती है तो यह मेरा नाम लगा देती है। मैया! यदि तुझे मेरी बात पर विश्वास न हो तो मनसुखा एवं दाऊ-भैया से क ले। 'कृपालु' कहते हैं ठाकुरजी की बात सुनकर भोली-भाली मैया मान गई एवं लाला को हृदय से लगा लिया।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 345-346