श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 85
माय! सखि झूठेहिं दोष लगाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: māya! sakhi jhūṭhehiṁ dosha lagāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1माय! सखि झूठेहिं दोष लगाय।
2इक दिन कही माय! पनघट सखि, मो घट दे उठवाय।
3हौं छोटो न उठाय सक्यों तब, कही चलहु ढिग माय।
4इक दिन कही याहि को ब्याहै, द्वै बापन को जाय।
5खाय बिलैया मैया! माखन, मेरो नाम बताय।
6देखु “कृपालु” मात! यह गूजरि, चाहति मोहिं पिटवाय॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखि के उलाहने का उत्तर देते हुए छोटे से ठाकुरजी कहते हैं-''अरी मैया! यह सखि झूठमूठ को ही दोष लगा रही है-सच यह है कि एक दिन इसने पनघट पर मुझसे कहा कि मेरा पानी से भरा हुआ घड़ा उठा कर सिर पर रख दे। मैं छोटा होने के कारण न उठा सका तब इसने धमकी दी, 'मैया के पास चलो फिर तुम्हें देखूँगी।' इसके अतिरिक्त एक दिन इसने मैया! तुझे भी गाली दी। इसने कहा कि कन्हैया तो दो बाप से पैदा हुआ है, इससे कौन ब्याह करेगा? अरी मैया! इसकी लापरवाही से इसका मक्खन बिल्ली खा जाती है और यह मेरा नाम लगा देती है।'' ठाकुरजी कहते हैं-''अरी मैया! देख तो यह गूजरी मुझे पिटवाना चाहती है।''
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 345