श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 91
लँगर मोते, डगर चलत कर रार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: laṁgara mote, ḍagara chalata kara rāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लँगर मोते, डगर चलत कर रार।
2लपटि झपटि झट पट पनघट घट, फोर तोर लर हार।
3अली गली साँकरि कर काँकरि, ताकरि गागरि मार।
4कह बर जोरी कर बरजोरी, बरजो री बटमार।
5मोहिं कह प्यारी भानुदुलारी, घूँघट वारी नार।
6नैनन कहि “कृपालु” कछु सैनन, बैनन नहिं रिझवार॥
हिन्दी भावार्थ
राधिका जी एक सखि से प्यारे श्यामसुन्दर के केये हुए प्रेमयुक्त ऊधमों का वर्णन करती हैं।)हे सखि! ऋधमी श्यामसुन्दर मुझे मार्ग में चलते हुए भी तंग करता है। पुझे देखते ही तुरन्त ही झपटकर पनघट पर लिपट जाता है न जब मैं कुछ खरी-खोटी सुनाती हूँ तब मेरा घड़ा भी फोड़ डालता है तथा मेरी मोतियों की लड़ों एवं मेरे हारों को तोड़ डालता है। अरी सखि! मटकी में ताककर निशाना लगाकर) काँकरी मारता है। सखि! वह निर्लज्ज मुझसे कहता है कि हमारी-तुम्हारी जोड़ी अच्छी है एवं ऐसा कहकर बरबस ऊधम करता है। कहने लगती हूँ, 'अरे! कोई इस ऊधमी से बचाओ। बार-बार 'प्यारी भानुदुलारी'एवं घूँघटवारी नारी'कहकर पुकारता है। 'कृपालु' कहते हैं कि अरी सखि! कहूँ, वह बिना कुछ बोले ही, आँखों के कटाक्षपात से ही पता नहीं क्या-क्या बातें करता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 350-351