# लँगर मोते, डगर चलत कर रार।

स्थायी पृष्ठ: https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/pad/prm-0359-m07-k091/
भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0359-M07-K091
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 91
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 167–168

[English](https://radhey.shreyam1008.com.np/en/prem-ras-madira/pad/prm-0359-m07-k091/) · [पुस्तक की अनुक्रमणिका](https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/) · [दोनों भाषाओं में पुस्तक पढ़ें](https://radhey.shreyam1008.com.np/PRM/?pad=359&mode=reader&lang=both) · [दोनों भाषाओं का स्रोत पाठ](https://radhey.shreyam1008.com.np/content/prm/prm-0359-m07-k091.md)

## मूल पद

<a id="line-1"></a>लँगर मोते, डगर चलत कर रार।  
<a id="line-2"></a>लपटि झपटि झट पट पनघट घट, फोर तोर लर हार।  
<a id="line-3"></a>अली गली साँकरि कर काँकरि, ताकरि गागरि मार।  
<a id="line-4"></a>कह बर जोरी कर बरजोरी, बरजो री बटमार।  
<a id="line-5"></a>मोहिं कह प्यारी भानुदुलारी, घूँघट वारी नार।  
<a id="line-6"></a>नैनन कहि “कृपालु” कछु सैनन, बैनन नहिं रिझवार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

राधिका जी एक सखि से प्यारे श्यामसुन्दर के केये हुए प्रेमयुक्त ऊधमों का वर्णन करती हैं।)हे सखि! ऋधमी श्यामसुन्दर मुझे मार्ग में चलते हुए भी तंग करता है। पुझे देखते ही तुरन्त ही झपटकर पनघट पर लिपट जाता है न जब मैं कुछ खरी-खोटी सुनाती हूँ तब मेरा घड़ा भी फोड़ डालता है तथा मेरी मोतियों की लड़ों एवं मेरे हारों को तोड़ डालता है। अरी सखि! मटकी में ताककर निशाना लगाकर) काँकरी मारता है। सखि! वह निर्लज्ज मुझसे कहता है कि हमारी-तुम्हारी जोड़ी अच्छी है एवं ऐसा कहकर बरबस ऊधम करता है। कहने लगती हूँ, 'अरे! कोई इस ऊधमी से बचाओ। बार-बार 'प्यारी भानुदुलारी'एवं घूँघटवारी नारी'कहकर पुकारता है। 'कृपालु' कहते हैं कि अरी सखि! कहूँ, वह बिना कुछ बोले ही, आँखों के कटाक्षपात से ही पता नहीं क्या-क्या बातें करता है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 350-351

[पिछला पद](https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/pad/prm-0358-m07-k090/) · [अगला पद](https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/pad/prm-0360-m07-k092/)

## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

- [आधिकारिक पूर्ण साहित्य संग्रह](https://www.jkpliterature.org.in/)
- [लेखक का आधिकारिक परिचय](https://jagadgurukripalujimaharaj.org.in/)
- [प्रेम रस मदिरा: आधिकारिक पुस्तक विवरण](https://www.jkpliterature.org.in/products/prem-ras-madira-regular-size)
- [संस्करण और स्रोत प्रमाण](https://radhey.shreyam1008.com.np/content/provenance.json)
- [पुस्तकालय के आवरणों का स्रोत विवरण](https://radhey.shreyam1008.com.np/content/books/index.json)
- [स्रोत और पाठ-सुधार](https://radhey.shreyam1008.com.np/collection/)

मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
