श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 77
पकरि गयो माखन चोरत कान्ह।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: pakari gayo mākhana chorata kānha
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1पकरि गयो माखन चोरत कान्ह।
2द्रुत युग-पानि नवनि मुख मेलत, चितवत चहुँ दै कान।
3यदपि निविड़-तम तनु-दुति दमकति, घन-दामिनि उनमान।
4लखि पूछति गोपी"तू को है?, धंसि आयो घर आन"।
5अति सभीत कह चौंकि कान्ह"मैं, आयो निज घर जान"।
6"कहा करत मटुकी बिच?""चींटी, अपसारत सच मान"।
7"सोवत शिशु कस आइ जगायो","सपनो लखि डरपान"।
8किमि “कृपालु” इमि देत थेगरी, मृषा फटे असमान॥
हिन्दी भावार्थ
( श्रीकृष्ण किसी गोपी के प्रेम में बँधे हुए उसके घर में जाकर चुपके से मक्खन खाने के लिए ज्यों ही मटकी में हाथ डालकर खाने लगे त्यों ही वह गोपी आ गई-उस अवसर का वृतान्त है।) कवि कहता है कि श्रीकृष्ण मक्खन चुराते हुए ही रंगे हाथों पकड़े गये। श्रीकृष्ण अपने दोनों हाथों से जल्दी जल्दी मटकी से मक्खन निकाल कर खाते जा रहे थे तथा चारों ओर कान लगाये देखते भी जा रहे थे। यद्यपि जिस स्थान पर श्रीकृष्ण ऐसा कर रहे थे वहाँ पर अत्यन्त प्रगाढ अंधकार था तथापि श्रीकृष्ण के शरीर से स्वाभाविक ही बादल में बिजली के समान हल्का प्रकाश छाया हुआ था। अतएव गोपी ने देख लिया एवं पूछा, 'अरे! तू कौन है जो मेरे घर में घुस आया है?'श्रीकृष्ण ने चौंककर अत्यन्त भयभीत होते हुए कहा, मैं कान्हा हूँ, मैंने समझा कि मेरा ही घर है, इसी भ्रम में चला आया।'फिर गोपी ने पूछा, "यदि तुम अपना ही घर समझकर भूल से यहाँ'चले आये तो यह बताओ कि यहाँ आकर मटकी में हाथ डाले हुए क्या कर रहे हो?'श्रीकृष्ण ने कहा, मैं चींटी निकाल रहा था।'फिर गोपी ने पूछा, 'मेरे सोते हुए बच्चों को क्यों आकर जगा दिया'तब श्रीकृष्ण ने कहा, मैंने नहीं जगाया, सपना देखकर डर गये होंगे।'"कृपालु कहते हैं कि हे श्रीकृष्ण! इस प्रकार सारे फटे हुए आसमान में कितने कपड़ों के जोड़ लगाओगे, अर्थात् कहाँ तक बातें बनाओगे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 337-338