श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 78
परीं सब बैर हमारे लाल।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: parīṁ saba baira hamāre lāla
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1परीं सब बैर हमारे लाल।
2हम पूछति छींके पै कैसे, पहुँचि सकत गोपाल।
3सुनु येहि छोट जान जनि मैया!, बड़ो होत है हाल।
4हम पूछति तुम सब के घर कत, पहुँचि सकत इक काल।
5सुनु मैया! इक काल अनेकन, रूप धरत यह बाल।
6भोरी मातु “कृपालु” न जानति, मायापति को जाल॥
हिन्दी भावार्थ
सखियों के उलाहनों को सुनकर झुँझलाई हुई मैया कहती है कि सब की सब ब्रजांगनाएँ हमारे कन्हैया के पीछे पड़ गयी हैं। मैं पूछती हूँ कि मेरा छोटा सा छोरा भला तुम लोगों के इतने ऊँचे छींके पर कैसे पहुँच सकता है। सखियाँ उत्तर देती हैं कि मैया! इस कन्हैया को छोटा न समझ, यह काम पड़ने पर तुरन्त ही बड़ा हो जाता है। पुनः मैया कहती है कि अच्छा मैं पूछती हूँ कि यह कन्हैया तुम सब गोपियों के घर एक ही समय में कैसे पहुँच सकता है? सखियाँ उत्तर देती हैं कि ये तेरा बालक एक ही काल में अनन्त रूप धारण कर लेता है। 'कृपालु'भी भोली भाली मैया से कहते हैं कि मैया! ये सखियाँ ठीक कहती हैं। यह मायापति भगवान् हैं, इसके जाल को तू नहीं जानती।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 339