श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 79
बात सुनु साँची साँची माय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bāta sunu sāṁchī sāṁchī māya!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1बात सुनु साँची साँची माय।
2ये ऐसी ब्रज ग्वालिनि जैसी, त्रिभुवन खोजि न पाय।
3"मो ते ब्याहु करहु"कहि मोते, सिगरी मृदु मुसकाय।
4जब मैया! हौं कहौं"पूछिहौं मैया सोँ हौं जाय"।
5तब मो कहँ बर्जन-हित तर्जनि, अँगुरिन सों डरपाय।
6पुनि कर पकरि कहत"हाँ करु न तु, दउँ ऊखल बँधवाय"।
7बेगि “कृपालु” ब्याहु करु मैया! सब मिटि जाय बलाय॥
हिन्दी भावार्थ
मैया की गोद में बैठे हुए कन्हैया तोतली भाषा में बड़े लाड़ से कहते हैं कि मैया सच्ची सच्ची बात सुन। ये ब्रज की ग्वालिनियाँ ऐसी हैं जैसी त्रैलोक्य में ढूँढने पर भी कोई न मिलेगी। यह सब मुझसे मुस्कराती हुई कहती हैं कि मेरे साथ ब्याह कर लो। जब मैया! मैं यह कहता हूँ कि अच्छा, पहिले मैं अपनी मैया से पूछ लूँ, तब तर्जनी अँगुली से धमकी देती हुई तुझसे पूछने को रोकती हैं एवं मेरा हाथ पकड़ कर कहती हैं कि ब्याह के लिए हाँ करो, नहीं तो झूठी मूठी शिकायत करके ऊखल में बँधवा दूँगी। इन सब के उलाहनों का यही गुप्त रहस्य है। 'कृपालु' के शब्दों में श्यामसुन्दर कहते हैं कि मैया जल्दी से मेरा ब्याह कर दे जिससे सारा झगड़ा अपने आप समाप्त हो जाय।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 339-340