# बात सुनु साँची साँची माय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0347-M07-K079
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 79
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 162–162

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>बात सुनु साँची साँची माय।  
<a id="line-2"></a>ये ऐसी ब्रज ग्वालिनि जैसी, त्रिभुवन खोजि न पाय।  
<a id="line-3"></a>"मो ते ब्याहु करहु"कहि मोते, सिगरी मृदु मुसकाय।  
<a id="line-4"></a>जब मैया! हौं कहौं"पूछिहौं मैया सोँ हौं जाय"।  
<a id="line-5"></a>तब मो कहँ बर्जन-हित तर्जनि, अँगुरिन सों डरपाय।  
<a id="line-6"></a>पुनि कर पकरि कहत"हाँ करु न तु, दउँ ऊखल बँधवाय"।  
<a id="line-7"></a>बेगि “कृपालु” ब्याहु करु मैया! सब मिटि जाय बलाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

मैया की गोद में बैठे हुए कन्हैया तोतली भाषा में बड़े लाड़ से कहते हैं कि मैया सच्ची सच्ची बात सुन। ये ब्रज की ग्वालिनियाँ ऐसी हैं जैसी त्रैलोक्य में ढूँढने पर भी कोई न मिलेगी। यह सब मुझसे मुस्कराती हुई कहती हैं कि मेरे साथ ब्याह कर लो। जब मैया! मैं यह कहता हूँ कि अच्छा, पहिले मैं अपनी मैया से पूछ लूँ, तब तर्जनी अँगुली से धमकी देती हुई तुझसे पूछने को रोकती हैं एवं मेरा हाथ पकड़ कर कहती हैं कि ब्याह के लिए हाँ करो, नहीं तो झूठी मूठी शिकायत करके ऊखल में बँधवा दूँगी। इन सब के उलाहनों का यही गुप्त रहस्य है। 'कृपालु' के शब्दों में श्यामसुन्दर कहते हैं कि मैया जल्दी से मेरा ब्याह कर दे जिससे सारा झगड़ा अपने आप समाप्त हो जाय।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 339-340

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
