श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 80
भला तुम कैसे हो भगवान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bhalā tuma kaise ho bhagawāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1भला तुम कैसे हो भगवान।
2प्रीति करत नित पर नारिन सों, लंपट नर उनमान।
3पतिव्रत-धर्म मिटावत आपुहिं, आपुहिं करत बखान।
4वेद वेद्य जब वेद न मानत, और कौन पुनि मान।
5हरि कह"दैहिक धर्म पतिव्रत, ता फल स्वर्गहिं जान।
6यह “कृपालु” परधर्म मोरि-रति, ता फल दिव्य महान"॥
हिन्दी भावार्थ
एक भोली भाली सखि कहती है कि हे श्यामसुन्दर तुम भला भगवान् कैसे हो सकते हो? तुम विषयासक्त मनुष्य की भाँति पर स्त्रियों से प्यार करते हो तथा स्वयं ही पतित्रत धर्म की वेदों में प्रशंसा करते हुए स्वयं ही उसे नष्ट भी करते हो। वेदों से जानने योग्य भगवान् ही जब वेद को नहीं मानता तो फिर भला और कौन मानेगा। श्यामसुन्दर ने कहा सांसारिक पतियों से अनन्य प्रेम होना ही पतित्रत धर्म है, जिसे दैहिक धर्म भी कहते हैं। इसका फल क्षणभंगुर स्वर्ग ही है एवं कृपालु' के शब्दों में परम पति परमेश्वर में अनन्य प्रेम होना ही परधर्म है, इसका फल अनन्त काल के लिए दिव्य परमानन्द प्राप्ति अथवा गोलोक प्राप्ति है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 340-341