श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 81
मातु टुक सुन ले याकी बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mātu ṭuka suna le yākī bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मातु टुक सुन ले याकी बात।
2सखि कह बनत न बात बनावत, कहत कहत रुकि जात।
3भला बिलैया मैया! कैसे, छींकेहिं पहुँचि सकात।
4कह्यो कन्हैया सुनु मैया! यह, कैसी है बतरात।
5याते पूछहुँ हौं भल छीकेंहि, पहुँचि सकत कत मात।
6तू मैया! कछु कहति न इन कहँ, मोहीं कहँ रिसियात।
7कह “कृपालु” सखि मौन भई सुनि, गइ घर अति खिसियात॥
हिन्दी भावार्थ
ठाकुर जी के उत्तर का प्रत्युत्तर देते हुए सखि कहती है-''अरी मैया! जरा कन्हैया की बात तो सुन। अभी इससे भली-भाँति बात बनाते नहीं बनती, अतएव बात करते-करते बीच-बीच में रुक-रुक जाता है। अरी मैया तू ही सोच। भला बिल्ली इतने ऊँचे छींके पर किस प्रकार पहुँच सकती है?''इतने में ठाकुर जी ने कहा-'"मैया देख, यह कैसी बातें बना रही है? जरा इस सखि से पूछ तो मैं इतना छोटा-सा इसके ऊँचे छींके पर कैसे पहुँच सकता हूँ?"ठाकुर जी कहते हैं-''मैया! तू इन सब को नहीं डॉटती, मेरे ऊपर ही क्रोध करती है''। 'कृपालु' कहते हैं कि ठाकुरजी का तर्क सुन कर सखि चुप हो गयी एवं खिसियानी-सी होकर सिर नीचा करके धर चली गयी।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 341-342