# मातु टुक सुन ले याकी बात।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0349-M07-K081
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 81
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 163–163

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>मातु टुक सुन ले याकी बात।  
<a id="line-2"></a>सखि कह बनत न बात बनावत, कहत कहत रुकि जात।  
<a id="line-3"></a>भला बिलैया मैया! कैसे, छींकेहिं पहुँचि सकात।  
<a id="line-4"></a>कह्यो कन्हैया सुनु मैया! यह, कैसी है बतरात।  
<a id="line-5"></a>याते पूछहुँ हौं भल छीकेंहि, पहुँचि सकत कत मात।  
<a id="line-6"></a>तू मैया! कछु कहति न इन कहँ, मोहीं कहँ रिसियात।  
<a id="line-7"></a>कह “कृपालु” सखि मौन भई सुनि, गइ घर अति खिसियात॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

ठाकुर जी के उत्तर का प्रत्युत्तर देते हुए सखि कहती है-''अरी मैया! जरा कन्हैया की बात तो सुन। अभी इससे भली-भाँति बात बनाते नहीं बनती, अतएव बात करते-करते बीच-बीच में रुक-रुक जाता है। अरी मैया तू ही सोच। भला बिल्ली इतने ऊँचे छींके पर किस प्रकार पहुँच सकती है?''इतने में ठाकुर जी ने कहा-'"मैया देख, यह कैसी बातें बना रही है? जरा इस सखि से पूछ तो मैं इतना छोटा-सा इसके ऊँचे छींके पर कैसे पहुँच सकता हूँ?"ठाकुर जी कहते हैं-''मैया! तू इन सब को नहीं डॉटती, मेरे ऊपर ही क्रोध करती है''। 'कृपालु' कहते हैं कि ठाकुरजी का तर्क सुन कर सखि चुप हो गयी एवं खिसियानी-सी होकर सिर नीचा करके धर चली गयी।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 341-342

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
