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RADHEY RADHEY

श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 82

मातु सुनु खरी खरी अब बात।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mātu! sunu kharī kharī aba bāta

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1मातु सुनु खरी खरी अब बात।

2तुम्हरोइ लाल अनोखो जायो, तुमहिं अनोखी मात।

3तुमहिं रहहु नँदगाँव आपने, हम सब है, अब जात।

4गोरस मिस गो-रस मोहिं माँगत, कहि प्यारी मुसकात।

5लोक-वेद-मर्याद मिटावत, सब सों जोरत नात।

6सो “कृपालु” ब्रजवास करे जो, धर्म देइ धरि पात॥

हिन्दी भावार्थ

एक सखि श्यामसुन्दर का उलाहना देते हुए मैया से कहती है कि आज मैं खरी-खरी सुनाने आयी हूँ। क्या मैया! तेरा ही अनोखा लाला है और क्या तू ही अनोखी मैया है? हम लोगों के भी तो लाला हैं और हम लोग भी तो मैया हैं। अब इस नंदग्राम में तुम ही रहो। हम सब लोग अब जा रहे हैं। यह तुम्हारा लाड़ला गोरस के माँगने के बहाने हम लोगों से तन मन माँगता है एवं 'प्यारी'कह कर मुस्कराता है। लोक- वेद की सनातन मर्यादा को नष्ट करते हुए पर स्त्रियों से प्रेम प्रकट करता है। 'कृपालु' कहते हैं अरी सखि! तू नहीं जानती ब्रजवास वही कर सकता है जो धर्म-कर्म को ताक पर रख दे।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 342