श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 83
मातु! सुनु साँची साँची बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mātu! sunu sāṁchī sāṁchī bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मातु! सुनु साँची साँची बात।
2कालि निकट यमुना-तट मैया! रह्यो सखन सँग न्हात।
3इतनेहिं माहिं सखिन मोहिं टेरीं, सुनियो श्यामलगात।
4हौं नहिं गयों सखिन तब बोलीं, चलहु आजु ढिग मात।
5ये मोते गागरि उठवावति, इनकी बड़ी जमात।
6गुलचन-गाल मार मोहिं सिगरी, हँसति न नेकु लजात।
7जो कहुँ इनकी बात न मानहुँ, तो मो पे रिसियात।
8बार बार मो कहँ डरपावति,"देन उरहनो जात"।
9ये “कृपालु” ऐसी ब्रज ग्वालिनि, बिनु एकहिं कर सात॥
हिन्दी भावार्थ
(गोपियों के बार-बार उलाहना देने पर जब मैया बहुत ही विरुद्ध हो गई तब भगवान् अपने को निरपराध सिद्ध होने पर प्रमाण देते हैं।) मैया! हूँ, ध्यानपूर्वक सुन। साथ स्नान कर रहा था, इतने ही में सखियों ने मुझे पुकार कर कहा कि ओ श्यामसुन्दर! जरा एक बात सुन जाओ। मैया! उनके बुलाने पर नहीं गया। बात है, मैया के पास चलो तब बताऊँगी। जल के भरे घड़े उठवाती हैं। अकेला क्या करूँ? मैया! गाल में गुलचे मारती हैं, निर्लज्ज की तरह हंसती हैं और जब कभी इनकी आज्ञा नहीं मानता, तभी यह अप्रसन्न हो जाती हैं एवं बार-बार झूठ-मूठ को ही उलाहने देने की धौंस बताकर मुझे डराती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि हे मैया! क्त फ कद द म क्र वा : दा क ब्रज की गोपियाँ इतनी झूठी हैं कि बिना एक ही के जोड़कर सात बना देती हैं। लगाती हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 343-344