# भला तुम कैसे हो भगवान।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0348-M07-K080
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 80
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 162–162

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>भला तुम कैसे हो भगवान।  
<a id="line-2"></a>प्रीति करत नित पर नारिन सों, लंपट नर उनमान।  
<a id="line-3"></a>पतिव्रत-धर्म मिटावत आपुहिं, आपुहिं करत बखान।  
<a id="line-4"></a>वेद वेद्य जब वेद न मानत, और कौन पुनि मान।  
<a id="line-5"></a>हरि कह"दैहिक धर्म पतिव्रत, ता फल स्वर्गहिं जान।  
<a id="line-6"></a>यह “कृपालु” परधर्म मोरि-रति, ता फल दिव्य महान"॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक भोली भाली सखि कहती है कि हे श्यामसुन्दर तुम भला भगवान् कैसे हो सकते हो? तुम विषयासक्त मनुष्य की भाँति पर स्त्रियों से प्यार करते हो तथा स्वयं ही पतित्रत धर्म की वेदों में प्रशंसा करते हुए स्वयं ही उसे नष्ट भी करते हो। वेदों से जानने योग्य भगवान् ही जब वेद को नहीं मानता तो फिर भला और कौन मानेगा। श्यामसुन्दर ने कहा सांसारिक पतियों से अनन्य प्रेम होना ही पतित्रत धर्म है, जिसे दैहिक धर्म भी कहते हैं। इसका फल क्षणभंगुर स्वर्ग ही है एवं कृपालु' के शब्दों में परम पति परमेश्वर में अनन्य प्रेम होना ही परधर्म है, इसका फल अनन्त काल के लिए दिव्य परमानन्द प्राप्ति अथवा गोलोक प्राप्ति है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 340-341

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
