श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 76
पकरि गयो चोरत माखनचोर।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: pakari gayo chorata mākhana chora
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1पकरि गयो चोरत माखनचोर।
2सूने घर घुसि खात रहे दुरि, नवनि चोर-सिरमोर।
3पाछे ते गोपी ने औचक, पकर्यो कर बरजोर।
4ल्याई बाँधि मातु यशुमति ढिंग, दियो उरहनो घोर।
5हरि कह"पद्मराग-मणि-कंकण, तपत पाणि रह मोर"।
6याही ते “कृपालु” हौं मैया!, दिय मटुकिहिं कर बोर"॥
हिन्दी भावार्थ
माखनचोर चोरी करते हुए पकड़े गये। चोरों के सरदार श्यामसुन्दर एक गोपी के सूने घर में घुस कर मक्खन खा रहे थे, पीछे से उस गोपी ने उनके दोनों हाथ जनर्दस्ती पकड़ लिये एवं बाँधकर मैया यशोदा के पास ले आयी तथा घोर उलाहना दिया। तब श्यामसुन्दर ने यह बात बनायी कि मैया मैं चोरी नहीं कर रहा था वरन् पद्मराग मणि के कंकण से जलते हुए अपने हाथों को 'कृपालु' के शब्दों में मक्खन की मटुकी में डुबो कर ठंडा कर रहा था।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 336-337