श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 75
नेकु दे माखन ओ ब्रजनार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: neku de mākhana o brajanāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1नेकु दे माखन ओ ब्रजनार।
2चलु हटु छाँडु गैल भल आयो, माखन चाखन हार।
3माखन चाखन के पूरब टुक, दर्पण मुखहिं निहार।
4नव लख धेनु नंद बाबा के, तबहुँ बन्यो बटमार।
5सब कारी करतूत तिहारी, सब जानत संसार।
6जाय कहूँगी नँदरानी पै, तोय लगावे मार।
7प्रथम “कृपालु” खाउँ माखन तब, खाउँ मार बलधार॥
हिन्दी भावार्थ
श्यामसुन्दर दही का दान माँगते हुए एक सखि से कहते हैं-अरी ओ ग्वालिन! थोड़ा सां मक्खन मुझे भी दे दे। सखि ने कहा, चलो, हटो, रास्ता छोड़ो, बड़े मक्खन के चखने वाले आये। मक्खन को चखने के पहले जरा अपना मुँह तो शीशे में देख आओ। बड़े कलंक की बात है कि नंद बाबा के घर में नौ लाख गायें हैं, तब भी तुम मक्खन के लिये डकैती करते हो। तुम्हारी समस्त काली करतूतों को सारा संसार जानता है। अगर न मानोगे तो मैं अभी जाकर तुम्हारी मैया से कह दूँगी और तुम मक्खन के बजाय मार खाओगे। 'कृपालु' के शब्दों में श्यामसुन्दर कहते हैं कि मैं पहले मक्खन खा लूँ तब शरीर में बल आ जाने के बाद मार भी खा लूँगा। तात्पर्य यह कि सीधे या टेढ़े तुमको मक्खन खिलाना ही पड़ेगा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 335-336