श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 74
निरत कर आजु ब्रह्म साकार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: nirata kara, āju brahma sākāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1निरत कर आजु ब्रह्म साकार।
2दै करताल मातु यशुमति-सँग, पग नूपुर झनकार।
3झिंगुली झीन छीन कटि किंकिनि, मोर पंख सिर धार।
4गोपद रज राजित तनु अलकनि, उरझि रहीं घुँघरार।
5तुतरिन बतियन कहि कछु गुन गुन, पुनि पुनि कर किलकार।
6लखिय “कृपालु” ब्रह्म-गति जेहि कह, माया गुन गो पार॥
हिन्दी भावार्थ
यशोदा के आँगन में वेदान्त के साकार सच्चिदानंद श्रीकृष्ण नृत्य कर रहे हैं। आज साकार-ब्रह्म नंदलाल बनकर मैया यशोदा के हाथ की तालिका-ध्वनि के संकेत पर नाच रहा है। पैरों में नूपुरे की मधुर ध्वनि हो रही है। वे श्रीकृष्ण बड़ी ही बारीक झिंगुली पहने हुए हैं एवं पतली-सी कमर में किंकिणी तथा सिर पः मोर का पंख धारण किये हैं, उनका सारा शरीर गायों के खुः के नीचे से निकली हुई धूल से सफेद हो रहा है। घुंघराले बाल उलझे हुए अत्यन्त ही मन को मोहित कर रहे हैं। तोतली भाष में कुछ गुनगुनाकर गाते हुए बार-बार किलकारियाँ भी माः रहे हैं। 'कृपालु'ज्ञानियों की ओर संकेत करके कहते है कि हे ज्ञानियों! मैं अधिक कुछ भी शाब्दिक शास्त्रार्थ करन उचित नहीं समझता। तुम लोग स्वयं चलकर अपने ब्रह्म क दशा देख लो, जिसे तुम माया एवं तीनों गुण इन्द्रियों से प कहते हो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 334-335